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नहीं रहे साहित्‍यकार पद्मश्री गिरिराज किशोर...

कानपुर. अपने साहित्य  से ज्ञान का प्रकाश बिखेरने वाले प्रकाशपुंज साहित्यकार गिरिराज किशोर (83 वर्षीय) का रविवार सुबह उनके आवास पर निधन हो गया. उन्होंने अपनी कालजयी रचना पहला गिरमिटिया से खूब ख्‍याति बटोरी थी. वह मूल रूप से मुजफ्फरनगर के निवासी थे और कानपुर के शूटरगंज में आकर बस गए थे. खास बात ये रही कि पद्मश्री पुरस्कासर प्राप्त गिरिराज किशोर आईआईटी कानपुर के कुलसफचिव भी रहे हैं. इनका जन्म 8 जुलाई 1937 को सूबे के मुजफ्फरनगर में ही हुआ था. इनके बाबा बड़े जमींदार थे लेकिन इन्हें जमींदारी प्रथा पसंद नहीं थी. 

गिरिराज मुजफ्फरनगर के एसडी कालेज से ग्रेजुएशन करने के बाद घर से 75 रुपये लेकर इलाहाबाद (प्रयागराज) आ गए थे. यहां उन्होंने फ्री लांस राइटिंग का काम शुरू किया. इससे मिले पैसों से ही गिरिराज अपना खर्चा चलाते थे. इलाहाबाद में ही रहकर उन्होंने 1960 में मास्टर ऑफ सोशल वर्क की पढ़ाई की और असिस्टेंंट इंप्लाईमेंट आफिसर के तौर पर नौकरी शुरू की. नौकरी के दौरान भी इनका साहित्य  प्रेम बरकरार रहा. इन्होंने महात्माौ गांधी पर अपनी रिसर्च शुरू की.
 
पहला गिरमिटिया के लेखक गिरिराज किशोर का एक अन्य प्रख्यात उपन्यास है. यह है 'लोग की पृष्ठाभूमि' जोकि मुजफ्फरनगर पर ही आधारित है. गिरिराज हिंदी के गिरते महत्व  पर बेहद चिंतित रहते थे. उनका मानना था कि हिंदी पर सिर्फ हिंदी दिवस के दिन ही चर्चा न हो बल्कि इसके उत्थान के लिए रोज नए काम होने चाहिए. वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर का मानना था कि साहित्य को अंतर्मन से जानने की आवश्यकता है. आज अंग्रेजी को वरीयता देने वाला वर्ग हिंदी भाषा को नकारता सा दिखता है. ये बात उन्हें नागवार गुजरती थी. 
 
जाने माने लेखक और चित्रकार चंचल ने अपना दु:ख साझा करते हुए कहा कि ये बेहद तकलीफ़देह खबर है. गिरिराज किशोर जी केवल लेखक नही थे, वे आजीवन सामाजिक सरोकार से जुड़े सवालों पर संजीदगी से केवल अपनी राय भर नही  देते थे बल्कि उपाय और साधन भी खोजते रहते थे. इसी दिशा में उन्हें गांधी मिल गए और  कहा जाने लगा कि वे गांधीवादी लेखक हैं. गिरिराज जी गांधी का निर्गुण जाप नही करते थे, वे बापू के सहज , सगुण उपाय को समाज के सामने रखते हैं. उनके उपन्यास, लेख और वक्तव्य इसी सत्य को उजागर करते हैं. हम दोनों के बीच उम्र का एक फासला जरूर रहा लेकिन रिश्ते का निर्वहन बराबरी से होता और इसकी शुरुआत उन्ही की तरफ से होती थी. हम दोनों अनगिनत सेमिनारों में एक साथ भागीदारी कर चुके हैं. उनका अचानक चले जाना, अखर गया.  

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