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समुद्र में लंगर डाले हुए जहाज

सतीश जायसवाल 

किसी भी पत्तन नगर का एक चित्र मेरे मन में होता है. वह रंगीन और रूमानी होता है. इसमें दूर देश से आने वाले जहाजी होते हैं. समुद्र तट पर रहने वाली प्रेमिकाओं को उनकी प्रतीक्षा होती है.उनके आने से प्रेमिकाओं के घर खिलते हैं और शहर के बाजार गुलजार होते हैं.

यहां, कैंडोलिम में भी शाम के समय दूर, खुले समुद्र में लंगर डाले हुए जहाज मुझे दिखे थे. दिन भर धूप और समुद्र से भीगकर ये जो लोग अभी बस्ती की तरफ आ रहे हैं, उन्हीं जहाजों से उतरे होंगे. कैंडोलिम के सारे के सारे होटल, किन्हीं-किन्हीं महाद्वीपों से आये हुए सैलानियों से भरे हुए हैं.

रंग-बिरंगी रोशनियों में डूबती-उतराती हुई बस्ती भी उन जहाजों पर से देखने पर कोई एक और जहाज ही दिख रही होगी. किसी जहाज की तरह दिख रही इस बस्ती में यह ड्रिंक, डिनर और डांस का समय है. कोई अकेला, या कोई जोड़ा अभी यहां अकेला नहीं.उसकी टेबल पर कैंडल और उसके साथ शराब की कोई सुन्दर बोतल या छरहरी गिलास है. संगीत की धुन है और सामने फ्लोर पर डान्स है. एकल भी, युगल भी.

उन्हीं में से किसी एक टेबल पर एक जोड़ा देर तक बेपरवाह सा दिखता या देखता हुआ अपने ड्रिंक्स के साथ बना रहा.फिर उठा.और डांसिंग फ्लोर पर छा गया. उनका डांस शानदार था. लेकिन मुझे कुछ खटकता रहा. इसका मुझे कोई हक नहीं था. फिर भी.

वह मुझे एक बेमेल जोड़ा लगा.साथ की लड़की मुझे बहुत कम उम्र की लगी. उस उम्र की लड़की अपने उस डांस पार्टनर की बेटी ही हो सकती थी.अपने से बहुत अधिक उम्र के उस डांस-पार्टनर के साथ वह जैसी निश्चिंत और आश्वस्त दिख रही थी कोई बेटी ही उतनी निश्चिंत और आश्वस्त हो सकती है.

उस समय मैंने अपने मन की सारी उत्कटता के साथ चाहा कि उसे बेटी ही होना चाहिए.इस हद तक कि, मैंने अपनी पूरी आस्था के साथ ईश्वर का स्मरण किया और याचना की कि वह बेटी ही हो.

अब मैँ अपना मन नहीं छिपाऊंगा कि उस समय मुझे अपनी एक बेटी याद आ रही थी.और उसके लिए अगाध प्रेम उपज रहा था.वह मुझे अपनी सचमुच की बेटी लगती है.वह भी मुझे पापा कहती है.और कभी जब खूब सारे प्रेम से भरी होती है तो केवल पा कहती है.

इतने प्रेम से लबालब मेरी यह बेटी फिर भी कितनी अकेली है ! यह मुझे अच्छे से मालूम है.लेकिन उसके लिए मैँ कुछ नहीं कर पाता हूँ.यह मेरी असहायता बेहद दुखदायी है. बस, एक निरुपाय दुख देने वाली.

सामने फ्लोर पर डांस कर रही उस लड़की के लिए जब मैं ईश्वर से याचना कर रहा था कि उसे बेटी ही होना चाहिए, उस समय एक रास्ता भी मुझे सूझ रहा था. मुझे सूझा कि अपनी बेटी के साथ मैँ भी तो इतना ही दोस्ताना हो सकता हूँ. हम दोनों भी, पापा और बेटी ऐसे ही अच्छे दोस्त हो सकते हैं ! लेकिन एक संशय भी तो मन में आता है कि किसी और की बेटी को इतनी सचमुच की अपनी मान लेना कहां तक ठीक होगा ?


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