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एक थी मीना कुमारी

वीर विनोद छाबड़ा 

कभी कभी शूटिंग के दौरान कुछ ऐसे अजीबो-ग़रीब हादसे होते हैं जो बरसों बाद भी याद रहते हैं.'पाकीज़ा' की शूटिंग से जुड़ा एक हादसा ऐसा ही है.कमाल अमरोही मध्य प्रदेश के शिवपुरी इलाके में आउटडोर शूटिंग के लिए गए थे.शूटिंग ख़त्म हो गयी.अब वापसी की बारी थी.रात का वक़्त था और लंबा सफ़र.मगर कारों का काफ़िला अचानक थम जाता है.पता चला कि पेट्रोल ख़त्म हो गया.शूटिंग में इतने ज़्यादा मसरूफ़ रहे कि किसी को पेट्रोल के इंतज़ाम का ख़्याल ही नहीं रहा.अब ये बियाबान इलाक़ा.दूर-दूर तक कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था.पेट्रोल किधर से आये? यूनिट के एक मेंबर ने बताया, इधर से रोज़ाना एक बस सुबह और शाम गुज़रती है.शाम वाली तो निकल गयी.अब सुबह वाली ही आएगी.यानी अब सुबह का इंतज़ार कर.

खाने-पीने को भी कुछ नहीं.साठ के सालों में मोबाईल का तो किसी ने नाम भी नहीं सुना रहा होगा.कमाल अमरोही परेशान कि अब क्या करें? उन्हें सबसे ज़्यादा फ़िक्र थी, मीना कुमारी की.तय हुआ कि रात यहीं गुज़ारी जाए.दूसरा कोई चारा भी नहीं था.कारों की खिड़कियों के शीशे चढ़ा दिए गए.

थोड़ी देर गुज़री ही थी कि अचानक कई लोगों ने कारों को घेर लिया और खिड़कियों को ज़ोर-ज़ोर से पीटने लगे.इससे पहले कि खिड़कियों के शीशे टूटते उन्हें नीचे उतार लिया गया.पता चला कि ये तो डाकूओं का गिरोह है.बंदूकें तन गयीं, जितना माल है, सब निकालो.यूनिट के सब लोग बुरी तरह डर गए.मीना जी तो थर-थर कांपने लगीं.

लेकिन मीना जी की नहीं, पूरी यूनिट किस्मत अच्छी थी.गिरोह के सरदार ने मीना जी को पहचान लिया, अरे ये तो मशहूर हीरोइन मीना कुमारी हैं.उसने बताया, मैं तो आपका बहुत बड़ा दीवाना हूं.

सबकी जान में जान आयी.जब सरदार को पता चला कि पेट्रोल ख़त्म होने की वज़ह से पूरी यूनिट यहां फंसी है तो वो और भी ज़्यादा मेहरबान हो गया.उसने सबके लिए रात में ठहरने और खाने-पीने का इंतज़ाम किया.अपने गिरोह के सदस्यों को सुबह तक ज़रूरी मात्रा में पेट्रोल का इंतज़ाम करने का हुक्म भी दिया.

सुबह हुई.अब चलने की बारी थी.सब लोग जल्दी से जल्दी निकल भागना चाहते थे, डाकू लोगों का क्या भरोसा? कब दिल बदल जाए.कमाल अमरोही और मीना जी ने डाकूओं के सरदार का शुक्रिया अदा किया.लेकिन सरदार ने एक एक शर्त रख दी, काफिला तभी आगे बढ़ेगा जब मीना जी ऑटोग्राफ़ देंगी.मीना जी ने हज़ारों ऑटोग्राफ़ दिए थे अब तक.लेकिन ये ऑटोग्राफ़ बहुत मुश्किल था.सरदार ने तेज धार वाला चाकू निकाला और मीना जी के सामने अपनी बांह बढ़ा दी, इस पर इस चाकू से ऑटोग्राफ़ दीजिये.

मीना जी डर गयीं.लेकिन मरता क्या न करता, मीना जी को खुद अपनी ही नहीं पूरी यूनिट की जान बचानी थी.उन्होंने कलेजे पर पत्थर रख और कांपते हुए चाकू से सरदार की बांह पर ऑटोग्राफ़ गोद दिए.खूनो-खून हो गया.सरदार ने आभार व्यक्त किया, आज ज़िंदगी सार्थक हुई.और फिर सब लोग फ़ौरन वहां से निकल लिए.अगले शहर पहुंच कर उन्हें पता चला, कि वो मुखिया और कोई नहीं उस इलाके का मशहूर डाकू अमृतलाल था.इस हादसे का ज़िक्र मशहूर पत्रकार और लेखक विनोद मेहता ने अपनी किताब, 'मीना कुमारी दि क्लासिक बायोग्राफी' में भी किया है.

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