जनादेश

इस अंधविश्वास के पीछे है कौन ? सरगुजा की मांड नदी का बालू खोद डाला लैंसेट ने लेख क्यों वापस लिया? क्या बड़ा मेडिकल घोटाला है यह ! अमेरिकी आंदोलन को ओबामा का समर्थन ये फेक न्यूज़ फैलाते हैं ? भारत चीन के बीच शांति का रास्ता तिब्बत से गुजरता है - प्रो आनंद कुमार पांच जून 1974 को गांधी मैदान का दृश्य ! रामसुदंर गोंड़ की हत्या की हो उच्चस्तरीय जांच-दारापुरी घर लौटे मजदूरों से कानून-व्यवस्था को खतरा ? अंफन ने बदली सुंदरबन की तस्वीर और तकदीर बबीता गौरव से कौन डर रहा है अख़बार से निकले थे फ़िल्मकार बासु चटर्जी देश में कोरोना तो बिहार में होगा चुनाव ? बुंदेलखंड़ लौटे मजदूरों की व्यथा भी सुने ! बिहार को कितनी मदद देगा केंद्र ,साफ बताएं एजेंसी की खबरें भरते हिन्दी अखबार ! दान में भी घालमेल ! मंच पर गांधी थे नीचे मैं -पारीख पार्टी और आंदोलन के बीच संपूर्ण क्रांति इसलिए पांच जून एक यादगार तारीख है !

अलगाव की स्थिति स्थाई नहीं होनी चाहिए - अशोक वाजपेयी

सुमन परमार

नई दिल्ली .घर पर रहते हुए एक लंबा समय बीत चुका है. बाहर की दुनिया में कोरोना की हलचल अभी भी अपने ख़तरनाक डैने फैलाए हुए है. दुनिया भर में स्वास्थकर्मी एवं सरकारें उसके डर को दूर करने एवं उसे जड़ से खत्म करने में दिन-रात जुटी हुई हैं. घर के भीतर की दुनिया में हम घर का काम और वर्क फ्रॉम होम के बीच इंतज़ार में हैं कि हमारे मिलने-मिलाने के दिन जल्द ही लौटेंगे. इस बीच, खाना, किताबें और संगीत हमारा साथ दे रहे हैं. हमारी उम्मीद को बनाए रखने में जी जान से जुटे हुए हैं.लॉकडाउन में राजकमल प्रकाशन समूह सभी के साथ खड़ा है. अपनी पूरी क्षमता के साथ हम लोगों की हर संभव मदद के लिए तैयार हैं. आभासी दुनिया एवं वाट्सएप्प के जरिए लोगों तक मानसिक खुराक़ पहुंचाने की हमारी प्रतिबद्धता निरंतर जारी है. हम देश के साथ हैं, हम पूरे विश्व के साथ हैं.

अलगाव की स्थिति स्थाई नहीं होनी चाहिए - अशोक वाजपेयी

40 दिन से हम एकांतवास में हैं. लेकिन आभासी दुनिया के जरिए हम दूसरे से जुड़े हुए हैं. गुरुवार की शाम राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने लोगों के साथ एकांतवास में जीवन एवं लॉकडाउन के बाद के समय की चिंताओं पर अपने विचार व्यक्त किए. आभासी दुनिया के मंच से जुड़कर अशोक वाजपेयी ने कहा, “इन दिनों इतना एकांत है कि कविता लिखना भी कठिन लगता हैं. हालांकि यह एक रास्ता भी है इस एकांत को किसी तरह सहने का. यही मानकार मैंने कुछ कविताएं लिखीं हैं.अशोक वाजपेयी ने कहा कि यह कविताएं लाचार एकांत में लिखी गई नोटबुक है. लाइव सेशन में उन्होंने अपनी कुछ कविताओं का पाठ किया–

“घरों पर दरवाज़ों पर कोई दस्तक नहीं देता / पड़ोस में कोई किसी को नहीं पुकारता/  अथाह मौन में सिर्फ़  हवा की तरह अदृश्य/ हलके से हठियाता है / हर दरवाज़े हर खिड़की को / मंगल आघात पृथ्वी का/ इस समय यकायक / बहुत सारी जगह है खुली और खाली/ पर जगह नहीं है संग-साथ की/  मेल-जोल की/  बहस और शोर की / पर फिर भी जगह है/  शब्द की/ कविता की/ मंगलवाचन की...”

लॉकडाउन का हमारे साहित्य और ललित कलाओं पर किस तरह का और कितना असर होगा इसपर अपने मत व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “हमारे यहाँ सामान्य प्रक्रिया है कि श्रोता या दर्शक संगीत या नृत्य कला की रचना प्रक्रिया में शामिल रहते हैं. लेकिन, आने वाले समय में अगर यह बदल गया तो यह कलाएं कैसे अपने को विकसित करेंगी? साथ ही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि, वो बिना कार्यक्रमों के जीवन यापन कैसे करेंगी? उनके लिए आर्थिक मॉडल विकसित कर उन्हें सहायता देना हमारी जिम्मेदारी है. जरूरत है इस संबंध में एकजुट विचार के क्रियान्वयन की. साहित्य में भी ई-बुक्स का चलन बढ़ सकता है.“

उन्होंने यह भी कहा, “कोरोना महामारी ने सामाजिकता की नई परिभाषा को विकसित किया है. लोग एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आ रहे हैं लेकिन महामारी का यह असामान्य समय व्यक्ति और व्यक्ति के बीच के संबंध को नई तरह से देखेगा. जब हम एक दूसरे से दूर- दूर रहेंगे, एक दूसरे को बीमारी के कारण की तरह देखने लगेंगे...तो दरार की संभावनाएं बढ़ जाएगीं. यह भय का माहौल पैदा करेगा. हमारा सामाजिक जीवन इससे बहुत प्रभावित होगा. हमारी कोशिश होनी चाहिए कि यह अलगाव स्थायी न हो.“

लॉकडाउन है लेकिन हमारी ज़ुबानों पर ताला नहीं लगा है. इसलिए हमें अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का पूरा उपयोग करना चाहिए. हम, इस समय के गवाह हैं.

 

लॉकडाउन के दौरान किताबों के उपर नए सिरे से बातचीत हो रही है. पढ़ने-पढ़ाने और लिखने को लेकर कई तरह के सवाल-जवाब आभासी दुनिया में बहस का मुद्दा बन रहे हैं. लॉकडाउन में किताबों पर होने वाली बातों को एक संपादक और एक पाठक की नज़र से देखते हुए राजकमल प्रकाशन समूह के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम ने बहुत सारी रोचक जानकारियां लोगों से लाइव साझा कीं.

'लॉकडाउन व किताबों की दुनिया' पर बात करते हुए संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम ने कहा, “लॉकडाउन के पहले दफ्तर आने-जाने के बाद घर पर कुछ समय मिल जाता था. लेकिन, फिलहाल वो समय घर का काम करने या वर्क फ्रॉम होम में बीत रहा है. ऐसे समय में किताब पढ़ने से ज्यादा, किताब सुनने का सुख मिल रहा है.“उन्होंने कहा, “एक अनुमान था कि भारत में आने वाले पांच-दस साल में ऑडियो बुक्स का चलन बढ़ेगा और फिलहाल ई-बुक्स को लेकर पाठकों में दिसचस्पी बढ़ेगी...लेकिन, ये परिस्थिति लॉकडाउन के दौरान बदलती हुई दिखाई दे रही है. घर पर रहकर घरेलू काम और वर्क फ्रॉम होम की व्यस्तता के बीच ऑडियो बुक्स सुनना ज्यादा सुविधाजनक साबित हो रहे हैं.“

सत्यानंद निरुपम ने कहा कि, “इन सब के बावजूद हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए छपी हुई किताब हर लिहाज से बेहतर है.“ आज, भिन्न माध्यमों के जरिए हमें हर तरह का कंटेंट उपलब्ध हो रहा है. लेकिन, इन सब में किताब पढ़ना सबसे स्वास्थपरक प्रक्रिया है.

उन्होंने कहा, “किताबें हमें स्पेस देती हैं. किताबें हमारी कल्पना के लिए गुंजाइश रखती हैं. किताबें हमें ठहर कर विचार करने के लिए समय देती हैं. दूसरे माध्यम हमारे उपर इतनी उदारता नहीं दिखाते. वे हमारी आंख और दिमाग के बीच कब्ज़ा जमाकर हमें अपने साथ भगाकर ले जाते हैं.“

यह भी सच है कि लॉकडाउन के बाद जब हम अपने सामान्य जीवन में लोटेगे, तब शायद लॉकडाउन के बाद की चुनौतियां किताबों के संदर्भ में ज्यादा सही-सही हम देख पाएंगे. लेकिन, ये चुनौतियां बहुत गहरे हमें प्रभावित करेंगी इसका अंदेशा हमें होने लगा है.सत्यानंद निरुपम ने कहा, “किताब पढ़ना एक मेडिटेशन है. अगर, हम ठहर कर किताब नहीं पढ़ सकते हैं तो इसका अर्थ है कि हमारे अंदर बेचैनी बहुत ज्यादा है. देखने और सुनने का सुख अलग होता है, लेकिन यह बहुत लंबा नहीं होता.“


मजदूर दिवस की दोपहर राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि इस समय मजदूरों के साथ हो रही परेशानियों को हम रोज़ देख रहे हैं, पढ़ रहे हैं. एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 10 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं.राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज पर लाइव बातचीत करते हुए आलोचक संजीव कुमार ने ‘साहित्य और सिनेमा में मज़दूर आंदोलन / सलीम-जावेद की 'दीवार’ के संदर्भ’ में बात करते हुए हाल ही में लिखी अपनी कहानी ‘दीवार-2’ का पाठ किया. संजीव कुमार ने बताया कि यह कहानी दीवार फ़िल्म के उस शुरुआती दृश्य की पृष्ठभूमि पर आधारित है जिसमें विजय के पिता ट्रेड यूनियन लीडर हैं और उन्होंने कंपनी मालिकों के दवाब में एक कागज़ पर दस्तख़त कर दिया है जो मज़दूरों के हक़ के खिलाफ़ है. संजीव कुमार की कहानी ‘दीवार 2’ मजदूर आंदोलनों की प्रासंगिकता पर लिखी गई मार्मिक कहानी है.

कहानी पाठ की अगली कड़ी में राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर पंकज मित्र ने अपनी कहानी ‘कफ़न रिमिक्स’ का पाठ किया. पाठ से पहले लोगों से बात करते हुए पंकज मित्र ने कहा कि, “रचना जीवन का जयघोष है. जो रचेगा नहीं, वो ही बचेगा.“शनिवार की शाम राजकमल प्रकाशन फ़ेसबुक लाइव पर सुप्रसिद्ध रचनाकार मन्नू भंडारी को एक झलक देख पाने की खुशी कहीं ज्यादा थी. कथाकार मन्नू भंडारी, अपनी सुपुत्री संपादक रचना यादव के साथ लाइव में शामिल रहीं. हालांकि वे पाठकों से मुखातिब तो नहीं हुईं लेकिन उनका साथ सुकूनदायक था. लाइव कार्यक्रम में रचना यादव ने मन्नू भंडारी की लिखी पहली कहानी ‘मैं हार गई’ का पाठ किया.

 

Share On Facebook

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :