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सायनागॉग का सूनापन

सतीश जायसवाल 

विदेशी मूल के जिन धर्मावलम्बियों ने भारत को अपना घर बनाया और यहां के उद्योग-व्यापार को दूर-दूर तक फैलाया, उनमें यहूदी भी शामिल हैं.भारत में आने वाले सबसे पहले यहूदी सीरिया से आये थे. बाद में ईरान, ईराक, अफगनिस्तान और अन्य पूर्वी योरोपीय देशों से भी यहूदी यहाँ आये. यहाँ आकर बसने वाले इन यहूदियों को तीन शाखाओं में बांटकर देखा जा सकता है -- कोचीन के प्राचीन यहूदी, बेने इज़राइली और बग़दादी यहूदी. इनमें, कोचीन समूह के यहूदियों को सबसे प्राचीन माना जाता है.

यहां बसने के साथ इन यहूदियों ने यहां अपने प्रार्थना स्थलों के निर्माण भी कराये. इन्हें सायनागॉग कहा गया. अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली और भव्यता के कारण ये सायनागॉग दर्शनीय हैं. और ऐतिहासिक भी. इनके साथ यहूदियों का अपना इतिहास भी जुड़ा हुआ है.भारत में यहूदी सबसे पहले कब आये ? इसका ठीक-ठीक पता नहीं मिलता. लेकिन यह अनुमान किया जाता है कि भारत में आकर बसने वाले विदेशी मूल के धर्मावलम्बियों में,यहूदी ही सबसे पहले थे. कोचीन का यहूदी समुदाय १६वीं सदी में यहां आ चुका था. और ई० सन १५६८ में निर्मित कोचीन के सायनागॉग को भारत में सबसे प्राचीन माना जाता है. बग़दादी शाखा के यहूदी बाद में आये, १८वीं सदी में. लेकिन उनके यहां आने और आकर बसने के ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध हैं. इन विवरणों के अनुसार भारत आने वाले, बग़दादी शाखा के,पहले यहूदी व्यापारी जोसेफ सेमाह थे. जोसेफ सेमाह सीरिया से चलकर १७३० ई० में सूरत के समुद्री तट पर पहुंचे थे. बाद में उनके वंशज मुम्बई और कोलकता जैसे बड़े व्यापारिक नगरों में फ़ैल गए.

यहूदियों के अतिरिक्त, विदेशी मूल के जिन धर्मावलम्बियों ने भारत को अपना घर बनाया और यहां के उद्योग- व्यापार को दूर-दूर तक फैलाया, उनमें पारसी भी हैं. पारसी ईरान से भारत आये. और यह कितना दिलचस्प है कि ईरान से आने वाले पारसी भी सबसे पहले सूरत के पास ही समुद्र तट पर उतरे थे. यह कोई अकेला संयोग नहीं बल्कि भारत में बसने वाले यहूदियों और पारसियों के बीच और भी कई समानताएं हैं.

पारसियों ने सूरत के पास ही -- सन्जान में अपनी सबसे पहली 'अग्यारी' की स्थापना की. 'अग्यारी' पारसियों का धर्मस्थल है. यहूदियों ने भी, सूरत पहुँचने के बाद, वहां अपने पहले सायनागॉग का निर्माण किया था. लेकिन अब उसके ध्वंसावशेष ही बचे.

सूरत के उस सायनागॉग और कोचीन के सायनागॉग के बीच लम्बा फैसला रहा है. पता नहीं क्यों ? ई० सन १५६८ में निर्मित कोचीन के सायनागॉग को भारत में सबसे प्राचीन माना जाता है.


बग़दादी यहूदी १७९८ में कोलकता पहुंचे. और अपनी धार्मिक गतिविधियों के लिए उन्होंने यहां भव्य सायनागागों के निर्माण कराये. कोलकता में यहूदियों के ५ सायनागॉग हैं. इनमें से २ में ही प्रार्थनाएं होती हैं. पहला सायनागॉग, जिसे सबसे प्राचीन बताया जाता है,कब का है ? इसका ठीक-ठीक पता नहीं चलता. और दूसरे सायनागॉग को, फुटपाथ पर बर्तन-भाड़े का अपना रोजगार-व्यापार फैला चुके व्यापारियों ने इस तरह घेर लिया है कि अब उसका पता नहीं चलता. अलबत्ता कैनिंग स्ट्रीट की भीड़ में भी, इसका नाम दूर से दिखाई देता रहता है -- ''नेवेन शलोम'' या नबी सलाम सायनागॉग. इस सायनागॉग का निर्माण सन १८२५ ई० में हुआ था. बाद में ई० सन १९११ में इसका पुनर्निर्माण कराया गया.

इस सायनागॉग में एक अत्यल्प संख्यक धार्मिक समुदाय के भारत में आने और बसने का जातीय इतिहास सुरक्षित है. लेकिन फुटपाथ पर अपना रोजगार-व्यापार फैला चुके कब्जधारियों ने इस सुरक्षित इतिहास का प्रवेश-द्वार ही मूँद दिया है. और किसी को इसकी फ़िक्र नहीं है. इतिहास की फ़िक्र करने की शायद अब ज़रूरत नहीं बची ?


सायनागॉग में रोशनी-पानी, साफ़-सफाई और देख-भाल के लिए यहां एक केयरटेकर है -- रब्बुल. उसके साथ काम करने वाले ५ और कर्मचारी भी. रब्बुल यहां यहां आने वालों को यहां के नियम-कायदे बताता है,इसके वैभवशाली दिनों की दास्तान सुनाता है और शनिवार-रविवार के प्रार्थना दिवसों की प्रतीक्षा करता है. ये दोनों दिन प्रार्थनाओं के लिए निर्धारित हैं. कोलकता में इने-गिने बचे हुए यहूदी धर्मावलम्बी इन प्रार्थनाओं में शामिल होने के लिए यहां आते हैं. रब्बुल और उसके साथ के ५ कर्मचारियों का जीवन यापन भी इन्हीं धर्मावलम्बियों के आश्रित है. लेकिन इनकी संख्या दिनों-दिन कम होती जा रही है.

पहले के दिनों में किन्हीं गैर-यहूदियों के लिए इस सायनागॉग में प्रवेश के लिए मनाही थी. अब अनुमति मिल जाती है. बस एक ही मनाही बची कि सर खुला हुआ नहीं होना चाहिए. अब प्रवेश के लिए अनुमति और सर ढांकने के लिए यहूदी टोपी भी रब्बुल के पास से ही मिल जाती है.

इस सायनागॉग की देख-भाल में रब्बुल अपने खानदान की तीसरी पीढ़ी का है. उसके पूर्वज ओडिशा से यहां आये थे. लेकिन रब्बुल को यह नहीं पता कि देख-भाल का यह जिम्मा अब कब तक उसके पास रहेगा ? जिन दिनों उसके पूर्वजों को इस सायनागॉग की देख-भाल का जिम्मा सौंपा गया था उन दिनों कोलकता में यहूदी समुदाय के ६ हजार लोगों की आबादी थी. आज कोलकता में यहूदियों के २०-२५ परिवार ही बचे होंगे.

कोलकता से यहूदियों का पलायन सन १९४८ ई० से शुरू हो चुका था. उसी वर्ष इज़राइल एक यहूदी देश की हैसियत के साथ अस्तित्व में आया, तभी से. अब कहा नहीं जा सकता कि ये बचे-खुचे परिवार भी किस दिन अपने देश का रुख कर लेंगे ? पारसियों के साथ यहूदियों की कई समानतायें हैं. लेकिन यह प्रवृत्ति उनसे अलग है. एक बार यहां आकर बस गए पारसी यहीं के होकर रह गए. वापसी की नहीं सोची. लेकिन यहूदियों ने अपने लिए देश वापसी का रास्ता खुला रखा. यहूदी जब यहां आये थे तब पृथ्वी पर उनका अपना कोई देश था भी नहीं. अब इज़राइल है, उनका अपना देश, जहां वे जा रहे हैं.

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