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जीते कोई, चुनाव आयोग तो हार गया

राजेंद्र  कुमार 

लखनऊ .सात चरणों में हुए लोकसभा चुनाव खत्म हो गए. पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने चुनाव कराने को लेकर चुनाव आयोग की तारीफ की है, लेकिन पिछले कई वर्षो से बेदाग रहे चुनाव आयोग (ईसी) की साख पर इस बार कई दाग लगे. विपक्ष की ओर से कहा गया कि चुनाव आयोग प्रधानमंत्री मोदी आयोग बन गया है. राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाया. ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से डरा हुआ बताया . कुल मिला कर इन चुनावों में शायद ही कोई बड़ा राजनीतिक दल हो जिसने चुनाव आयोग की मंशा और कामकाज पर सवाल न खड़े किए हों. 

राजनीतिक दलों के ऐसे आरोपों के बीच में ही तीसरे आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयोग सुनील अरोड़ा के कामकाज पर सवाल खड़े किये. और एक पत्र लिख कर ये कहा कि उन्हें मजबूर किया  जा रहा है कि आयोग की संपूर्ण बैठक में शामिल न हो. उनकी असहमतियों को दर्ज नहीं किया जा रहा है. अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ की गई कई शिकायतों के फैसले में असहमति जताई थी. आयोग पर सवाल उठा था कि वह आचार संहिता के उल्ल्घंन के मामले में प्रधानमंत्री का बचाव कर रहा है.  देश में आम चुनाव के बीच में चुनाव आयोग में इस तरह का विवाद पहले कभी नही हुआ.  एक चुनाव आयुक्त का ये लिखना कि चुनाव आयोग कानून से नहीं चल रहा है. यह समान्य घटना नहीं है. और चुनाव आयोग को शर्मशार करने के लिए काफी है. और इस मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि आयोग के तीन सदस्यों से एक-दूसरे का क्लोन या टेम्पलेट होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है. 

सुनील अरोड़ा की ये सफाई किसी को भी उचित नहीं लगी. इसकी तमाम वजहें है. इसे सिलसिले वार समझे. तो सबसे पहले ये जाने कि खत्म हो चुके फर्जी मतदान को लेकर भी इस बार चुनाव आयोग को शिकायतें मिली. तो इस बाहर भी लाख दावों के बावजूद ऐसे लोगों की भी कमी नही रही जिन्हें वोट देने से वंचित कर दिया गया। हर चरण के मतदान में हर राज्य में लोगों के नाम मतदाता सूची से काटें  जाने की शिकायते मिली मिली. वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनावों के दौरान भी ऐसी शिकायतें मिली थी. चुनावों के दौरान हिंसा की घटनाओं को रोकने के लिए भले ही चुनाव आयोग ने सात चरण में मतदान कराने का फैसला लेकर यह सुनिश्चित किया था कि सुरक्षा पर आंच न आए। लेकिन पश्चिम बंगाल में हर चरण में मतदान के दौरान हिंसा हुई. यूपी में भी मारपीट और धमकाने की घटनाएं हर मतदान के दौरान हई. ये सब इस लिए हुआ क्योंकि  चुनाव आयोग और उसका तंत्र कामकाज और नियंत्रण कई बार डगमगाता दिखा. 

दरअसल, आयोग अपने कुछ फैसलों को लेकर ही सवालों के कठघरे मे आ गया। वर्ष 2014 में चुनाव आयोग ने बीजेपी के प्रधानमंत्री पर के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के मतदान परिसर में चुनाव चिह्न दिखाने पर जिस तेजी के साथ एफआइआर दर्ज करायी थी वैसी तेजी पूरे चुनाव के दौरान कभी नहीं दिखी. प्रधानमंत्री के चुनाव आचार संहिता का उल्लघन करने के मामलों पर देर से फैसले लिए गए. आयोग का ही रिकार्ड बताता है कि 9 अप्रैल को लातूर में प्रधानमंत्री मोदी ने पुलवामा और बालाकोट के नाम पर वोट मांगा.  इस मामले में हुई शिकायत पर  20 दिन लग गए फैसला लेने में. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बजरंग बली बनाम हजरत अली का नारा दिया, लेकिन चुनाव आयोग उन्हें प्रचार से प्रतिबंधित करने के बावजूद प्रतिबंध की अवधि के दौरान खबरिया टीवी चैनलों पर हनुमान चालीसा का जाप करते हुए असहाय की तरह देखता रहा। और योगी आदित्यनाथ ने बाद में ये कहा कि मुझे बजरंग बली का नाम लेने पर दंडित किया गया, पर प्रतिबंध की अवधि के दौरान मैंने उनके नाम का जाप किया. 

भोपाल से बीजेपी की प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर के बाबरी मस्जिद ढहाने का गर्व करने वाले बयान पर चुनाव आयोग ने उन पर 72 घंटे का बैन लगाया पर प्रज्ञा ठाकुर भी योगी आदित्यनाथ की तर्ज पर एक मंदिर से दूसरे मंदिर में पूजा करती टीवी चैनलों पर दिखती रही. सातवें चरण में जब प्रचार थम गया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ और बद्रीनाथ पहुँच गए. और जिस दिन सातवें चरण में आठ राज्यों में मतदान हुआ उसी दिन अख़बारों में पीएम मोदी के केदारनाथ में पूजा करने के फोटो छपे. टीवी चैनलों पर पीएम मोदी की पूजा करते हुए दिखाए गए. चुनाव आयोग भी ये सब देख रहा था, पर उसने योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रज्ञा तक के  टीवी चैनलों पर दिखती जा रही फुटेज को रोकें के लिए आदेश नहीं दिए. सवाल उठता है कि क्यों चुनाव आयोग ऐसे निर्देश जारी नहीं कर सकता था कि जिन नेताओं पर बैन लगाया गया है,  प्रतिबंध की अवधि के दौरान इए प्रतिबंधित नेताओं को टीवी चैनल न  दिखाएं! आयोग ने ऐसा साहस नहीं दिखाया. और जब आयोग ने हिम्मत दिखाते हुए पश्चिम बंगाल में सातवें चरण का प्रचार कुछ घंटे पहले रोका तब भी ये आरोप लगा कि पीएम मोदी की सभा होने के बाद ही आयोग में चुनाव प्रचार पर रोक लगाई. 

शायर यही वजह रही कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 20 मई को चुनाव आयोग कई आरोप लगाये. राहुल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष आयोग का समर्पण जग जाहिर हो गया है. राहुल गांधी ये ट्वीट भी किया कि चुनावी बांड और ईवीएम से लेकर चुनाव के कार्यक्रम में छेड़छाड़ तक, नमो टीवी, ‘मोदीज आर्मी’ और अब केदारनाथ के नाटक तक चुनाव आयोग का मिस्टर मोदी और उनके गैंग के समक्ष समर्पण सारे भारतीयों के सामने जाहिर है. चुनाव आयोग का डर रहता था और उसका सम्मान होता था. अब नहीं रहा. देखा जाये राहुल और विपक्ष के नेताओं ने चुनाव आयोग पर जो आरोप लगायें हैं, उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है.  

सच्चाई यह है कि आचार संहिता उल्लंघन को लेकर आयोग अपना रुतबा नहीं दिखा पाया। कुछ फैसले जल्दबाजी में दिखे तो कुछ पर कार्रवाई पूरी नहीं हो सकी. लेकिन पूरे चुनाव के दौरान सबसे बड़ी कमी हर चरण के मतदान में दिखी. वह कमी थी मतदान प्रतिशत में ज्यादा इजाफा ना होने की. यूं तो आयोग ने मत प्रतिशत बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए। फिर भी सबसे हाईप्रोफाइल मानी जाने वाली देश की अधिकाँश सीटों पर धीमी गति से मतदान हुआ. मतदान का प्रतिशत बढ़ाना भी आयोग की जिम्मेदारी थी, जिसे वह ठीक से नहीं निभा सका है, वर्ष 2014 के मुकाबले इसबार यूपी में मतदान का प्रतिशत चार से पांच प्रतिशत ना बढ़ाना इसका सबूत है. ये आयोग का कामकाज पर लगा एक प्रमुख दाग है. आयोग को अपनी साख पर लगे दागों के बारे में सोचकर इन चुनावों में रह गई कमियों को दूर करने के पुख्ता उपाय खोजना चाहिए. 


कार्टून साभार सत्याग्रह डाट काम से 

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