पहाड़ की लालटेन बुझ गई ,नहीं रहे मंगलेश डबराल !

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पहाड़ की लालटेन बुझ गई ,नहीं रहे मंगलेश डबराल !

अंबरीश कुमार 

पहाड़ की लालटेन बुझ गई .मंगलेश डबराल जी नहीं रहे .यह सूचना कार्यक्रम के बीच में दी गई .अखर गया उनका इस तरह जाना .शाम करीब पांच बजे ही ज्योतिर्मय से फोन कर पूछ रहा था कैसी तबियत है पर जवाब था कि अभी भी गंभीर हैं .वेंटिलेटर पर है .करीब हफ्ता भर पहले ही फोन पर बात हुई तो आवाज साफ़ नहीं थी पर अटक अटक बोल रहे थे .थोड़ी देर ही बात हुई .

उनसे अपना साथ लखनऊ में अमृत प्रभात से रहा .जनसत्ता में काफी दिन उनका सानिध्य मिला .खूब मौका भी दिया उन्होंने लिखने का रविवारीय में .जनसत्ता के बाद शुक्रवार में वे अपने सलाहकार संपादक थे .तब करीब करीब रोज ही बात होती खबरों को लेकर .कवर स्टोरी को वे ही निखारते तराशते थे .कितने लोगों को उन्होंने पत्रकारिता में आगे बढ़ाया .उनके जैसा संपादन करने वाला मैंने दूसरा कोई नहीं देखा .उनके लेखन का जादू हम देखते रहे हैं .वे देश के मशहूर कवि लेखक थे पर कोई भी कभी भी उनसे सहजता से मिल सकता था . पर खबरों में वे रियायत भी नहीं बरतते .भले कोई करीबी हो .कई मोर्चे पर उन्हें एक साथ लड़ते देखा है .भूख ,भुखमरी ,गरीबी से लेकर खेती किसानी पर उनका लिखना भी देखा है .जन आंदोलनों के पक्ष में खड़े होते देखा है .मजहबी गोलबंदी के खिलाफ उन्हें मोर्चा खोलते भी देखा है .सरोकार वाली पत्रकारिता को उन्होंने और उंचाई दी जो हमेशा याद रखी जाएगी .हाल में ही ज्ञानरंजन पर उन्होंने अदभुत संस्मरण लिखा .शुरू से अंत तक पढ़  डाला फिर उठा .सब याद आ रहा है .पर वे अब खुद संस्मरण का हिस्सा बन गए गए है .जनसत्ता परिवार का एक और प्रतिभाशाली पत्रकार चला गया .हाल में ही श्रीश जी गए फिर मंगलेश जी .वे महादेवी सृजन पीठ के कार्यक्रमों में रामगढ़ आते तो मित्र मंडली के साथ बैठकी भी होती .ये फोटो मैंने तभी ली थी .अपने घर में एक पुराना लालटेन भी है जो कभी कभार जलता भी है .मंगलेश जी को एक बार दिखाया भी था .पहाड़ पर लालटेन उनकी मशहूर कविता भी तो थी .वह लालटेन आज बुझ गई .विनम्र श्रद्धांजलि .


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